कामिनीकौशल शीलहरण

मेरे दफ्तर में 18 मर्द और 9 महिलाएं काम करती हैं। मेरी नजर महिलाओं पर टिकी रहती है, उनके साथ व्यभिचार करने। इन 9 महिलाओं को महिला कम और स्त्रियाँ ज्यादा कहना चाहिए। इनमें कुछ कन्याएँ, कुछ युवतियाँ, और कुछ महिलाएं या औरतें हैं जिन्हें स्त्री या नारी कहना शोभा देता है। रंजना 23 वर्ष की है, नवविवाहिता; कुसुम रानी 32 की, विवाहिता, इसके एक 13 साल की बच्ची भी है। नम्रता 27 की, मोटीताजी पर सेक्सी; वह इस उम्र में भी कुंवारी। एक और बता दूँ, मीनाकुमारी– यह 35 की होते हुए भी काफी मादक, भरी-भरी, और मांसल; ये भी शादीशुदा। मैं इन्हें कामिनी स्त्रियाँ कहा करता।

मैं इस दफ्तर में बड़ा अफसर हूँ, रिटायरमेंट के करीब। मेरा नाम कोकलाप्रसाद शास्त्री, उम्र 59, कद नाटा, रंग गहरा सांवला, चेहरे पर चेचक के दाग, शरीर के हर हिस्से पर घने काले-काले बाल, पेट कुछ आगे बढ़ा हुआ, छाती भरपूर चौड़ी, और मेरी जांघें और चूतड़ तो ‘ वो मोटी-मोटी मस्त’; कुल वजन 90 किलो।

मैं मोटे तौर पर कन्यारसिक हूँ अर्थात स्कूल गर्ल्स की चुदाई-प्रवीण, और इस क्षेत्र में मैंने बड़े झंडे गाड़े हैं। लेकिन शौक बदलने को मैं बहुत बार ( लेकिन हर बार नहीं ) 19 वर्ष से ऊपर की रमणियों को भी चोद लेता हूँ। मेरा हाल का क्रियाकर्म वही रहा, अर्थात कामिनियों का शीलहरण :– चार कामिनियों का शीलहरण ! इन रमणियों के नाम व उम्र ऊपर बता चुका हूँ पर अब असल काम, कामुक काम।

काफी समय से मेरी नजर कुसुम रानी पर टिकी थी, इस देवी के मम्मे और चूतड़ दोनों पुष्ट और लोचदार थे। मोटीताजी नम्रता से तो मेरा बहुत बार सेक्सी हंसी-मज़ाक हो जाता। रंजना ठीक मेरे नीचे काम करती, मैं बहुत बार इसे डिक्टेशन देने बुलाता तो खुले सोफ़े पर डिक्टेशन देता, उस समय अक्सर मेरे पेंट की ज़िप खुली रहती। और मीनाकुमारी के तो कहने ही क्या– उसके फूले-फूले मोटे-मटक गाल, ओठों का रस, और मोती-जैसे दांतों की दमक मेरे हृदय में घुस घुसफुस करती।

अब उस दिन की बात बता रहा हूँ। उस दिन भारी बरसात के अंदेशे से दफ्तर के सब लोग छुट्टी कर गए थे। सिर्फ ये चार रमणियाँ रह गई थीं दफ्तर के भीतर। ये भी निकलने वाली ही थी की बरसात शुरू हो गई; तेज और  भारी। मेरे लिए यह अच्छा मौका था, इनकी  > > ” लेने को”। मैंने इन चारों को अपने कक्ष में बुला लिया। मेरा चेहरा कामुकता से भरा हुआ था और जीभ लपलपा रही थी। मैंने अपने कक्ष की टेबल पर  करारे नोटों के चार बंडल रख छोड़े थे इन कामिनियों को देने के लिए। इन कामिनियों या रमणियों को बुलाने के बाद मैंने इन्हें ये नोटों के बंडल दिखाये और कहा — ‘ ये तुम्हारा ईनाम है, बस तुमको मुझे तन-मन से खुश करना है!’ यह कह मैं राक्षस की तरह हंसने लग गया। मुझे उम्मीद नहीं थी पर सहसा कुसुम रानी बोली– ‘जी, आपकी क्या सेवा करें ‘, दूसरी रमणियाँ भी चहकीं और बोली — ” जी, जी, जी !!!”

मैं पहले कुसुम रानी पर लपका। उसने अपने तन-बदन पर स्वच्छ सफ़ेद, झकाझक सफ़ेद साड़ी पहन राखी थी और वैसा ही ब्लाउज, गले में मंगलसूत्र था। साड़ी के भीतर पेटीकोट भी स्वच्छ सफ़ेद और ब्रा भी वैसी ही। ब्रा, जैसा कि मुझे बाद में पता चला, ज़िप वाली थी। पेटीकोट के भीतर एक नन्ही-सी पेंटी भी थी, भक सफ़ेद। सिर के केशों बिच चमेली के सफ़ेद फूलों का गजरा था, भीनी महक, गुल गुलजार। मेरे लिए वह रंभा या मेनका अप्सरा थी।

मैं कुछ देर के लिए बाथरूम गया और वहाँ से वस्त्र बदल कर निकला। मैंने भी स्वच्छ सफ़ेद निकर और टी-शर्ट पहन लिया था मगर भीतर बनियान या अंडरवीअर नहीं पहना। मैं फिर कुसुम रानी के पीछे इस अवस्था में लग गया। उसकी साड़ी मेरे निकर से चिपक रही थी। इस समय मेरा पहला काम इस कामिनी का चीरहरण करना था। उसका ब्लाउज सफ़ेद साड़ी से ढका हुआ था, मैंने पहले उसे टटोला और फिर उस लज्जावती की साड़ी उघाड़ने लगा। मेरी पुष्ट जांघें उसके नितंबों से सैट गई थी और इस अवस्था में मैंने उसे आगे को धकेला। धकेलते हुए उसे बाथरूम में ले गया। बाथरूम काफी बड़ा था, वहाँ एक आदमक़द शीशा भी था, ठीक वहाँ उसे खड़ी किया ताकि वह चीरहरण का पूरा नज़ारा देख सके। एक झटके में मैने साड़ी उघाड़ना शुरू किया। साड़ी उघाड़ते हुए मैं उसके नितंबों पर चुटकी भी करता था। वह ”ऊह, ऊह ‘ कर रही थी। साड़ी को मैंने बुरी तरह से उघाड़ा जिससे  वह कुछ फट भी गई। अब वह सिर्फ एक झीने पेटीकोट में थी। इसके बाद मैंने उसका ब्लाउज खोला, दांतों से। भीतर ब्रा छोटे कद की थी जिसमें से मम्मों का काफी हिस्सा बाहर झलक रहा था। मैंने उसके मम्मे मथे और  फिर ब्रा खींच कर नीचे पटक दी। फिर साली का पेटीकोट ऊंचा कर उसके गोरे नितंबों का जायजा लिया। पेटीकोट का नाड़ा खोल कुसुम रानी को अर्ध नग्न, अधनंगी कर डाला। वह इस समय सिर्फ पेंटी में थी; मैंने  अपने निकर की ज़िप खोल दी जिससे  मेरा पुष्ट व तना हुआ लंड कुसुम रानी के नितंबों से सीधे टकराने लगा। मेरा लौड़ा बहोत मोटा-मोटा था और कुसुम प्यारी उसे ठीक से महसूस कर रही थी। फिर मैंने अपना निकर खोल दिया, उसे अपने शरीर से झटक मैं कमर से नीचे पूरा नंगा हो गया। मेरा पूरा नंगा लंड कुसुम रानी के नितंबों के दोनों गोलकों से टकराने लगा कभी दायीं ओर तो कभी बायीं ओर; मैंने कुसुम रानी की पेंटी भी खोल दी, हाँ, अब वो मादरजात नंगी थी।

उसे गोद में उठा कर बाथरूम से बाहर लाया जहां उसकी तीन सखियाँ मुझसे चुदने के लिए अपनी-अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। कुसुम को तो मैं नंगी कर ही चुका था, अब नम्रता रानी को नंगी करना था। वह पक्की मोटीताजी थी। उसने लहंगा-चोली पहन रखी थी। मैं कसम से पूरा नंगा था और मुझे शरम नहीं थी। मैंने उसका लहंगा ऊंचा किया और भीतर की झलक देखी, भीतर उसने कुच्छ भी नहीं पहन रखा था जिससे मुझे उसकी कुंवारी चूत के दीदार हो गए। वह लहगा भी मैंने उसका उतार दिया। अब नम्रता रानी भी अधनंगी। मैंने कुसुम व नम्रता को कहा कि वो आमने-सामने हो एक-दूसरी से सट जाए। जब दोनों एक-दूसरी से चिपक गईं यानि नम्रता की चूत कुसुम की चूत से भिड़ गई  तब मैं फिर से कुसुम रानी की गांड से चिपट-चिपक गया। इधर मेरा मोटा-ताजा लंड कुसुम की गांड के छेद में घुसने लगा उधर मैंने अपने हाथों से नम्रता की गांड भी टटोली। उसकी गांड कुसुम की गांड से ज्यादा चौड़ी-चकली और मोटी थी पर चिकनी और गुदाज-मांसल थी। मैंने नम्रता की गांड में अंगुल की और उसकी गांड अश्लीलता से छेड़ने लगा। पीछे से मैं दुष्ट की तरह कुसुम की गांड़ मार रहा था। मेरा लंड़ 6 इंच की गहराई तक कुसुम की गांड़ में घुस चुका था। नम्रता की गांड़ में भी मैने 4 इंच की गहराई तक अपनी दो अंगुलियाँ धंसा दी थी, फिर तीन कर दी और  तीनों अंगुल  आगे–पीछे करते हुए, घिस्सा लगाते गांड़ क्रिया करने लगा। उधर कुसुम रानी की गांड़ तो मैं रेल के इंजन की तरह मार रहा था, लंड़ मेरा 7 इंच आगे तक घुस्स गया था, आह कुसुम। कुसुम हाँफ रही थी इसलिए मैंने कुछ विश्राम लिया।

इस विश्रामकाल में मैंने मीनाकुमारी को बुलाया उसकी लज्जाहरण करने। मुझे विवाहिताओं की लज्जा उघाड़ने में कुछ ज्यादा ही मजा आता था। मीना 35 की थी व उसके दो बेटियाँ थी, एक 15 साल की व दूसरी 13 की। पति अक्सर प्रवास में रहता। मीना का डीलडौल सबसे भारी व मांसल था, साथ में वह सुंदर, सेक्सी, और सुकुमार भी थी। भले ही शादीशुदा हो पर ऐसी मस्तानी औरत को चोदने में धर्म होता है। मीना क्रिस्टन थी, ईसाई। वह स्कर्ट-टॉप्स में थी। मैने उसे बुलाया निकट, उसके टॉप्स खोले व मम्मों का मुंह से जायजा लिया। भारी, गोल, आम की गुठली से मम्मे थे और चूँची अफगान मुनक्का-जैसी। स्कर्ट में हाथ घुसा उसकी पेंटी खोल दी और उसे रंजना की तरफ फेंक दिया। फिर उसका स्कर्ट उतार उसे अपनी मोटीमटक गोद में बिठाया। स्वाभाविक था कि मेरा लंड़ उसकी गांड़ में फक्क से सरक गया। कन्या हो, लड़की हो, या औरत — मैं सबसे पहले उन सबकी गांड़ जरूर मारता हूँ। मीना की चूत भी अच्छी थी।

विश्राम के बाद मैंने नम्रता की  कुंवारी गांड़  में अपना लौड़ा ठूंस कर  मजा मारने का कार्यक्रम किया। पहले की तरह ही नम्रता व कुसुम रानी को आमने-सामने से नंगी-नंगी चिपकाया, और मीना भी नंगी हो चुकी थी इसलिए उसे समझाया कि वो मेरी गांड़ के पीछे लग ज़ोर-ज़ोर से मुझे धक्का मारे। कुंवारी नम्रता की गांड़ में मेरा गैंडा-जैसा भरकम लंड़ ठीक से फंस नहीं रहा था इसलिए मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी गांड़ को चौड़ा किया, थूक लगाया, और घप्प से घुसा दिया। पीछे से मीना मेरी गांड़ पर धक्का लगा रही थी और आगे से कुसुम भी नम्रता के शरीर पर चोट कर धक्का लगा  रही थी। इस क्रिया से नम्रता की गांड़ मारना सुखकारी हो गया। मैं कुत्ते की तरह नम्रता की गांड़ मार रहा था। नम्रता के गालों को चाट और काट भी रहा था, और कह रहा था अभी तो मैं मीनाकुमारी की गांड़ भी मारूँगा।

अगला नंबर मीनाकुमारी क्रिस्टन का था। मैंने उसकी गांड़ दूसरे ढंग से मारी। उसकी गांड़ मदमस्स्त, प्यारी-प्यारी, और सबसे भारी थी। मैंने पहले उसकी गांड़ पर तमतमा कर कई धौल जड़े। फिर उसकी गांड़ की मालिश की। उस पर इलायची और शहद चस्का किया। फिर उसकी गांड़ को मुंह में भरा, चाटा, और चूँसा। मीना की गांड़ के छेद में मैने ढेर-सा शहद उँड़ेला, और उसका छेद बार-बार चूँसा। एक सोफ़े पर चढ़ा उसका सिर नीचे किया, टांगें भरपूर चौड़ी की, और गांड़ के गोलकों को विपरीत दिशा में खींचा जिससे कि मीना जी  की गांड़ के छेद के शुभ दर्शन हो सके। तत्पश्चात मैंने देवी मीनाकुमारी की गांड़ को बजाना शुरू किया, और पूरे पौन घंटे रगड़ा। वाह हो—  3 इंच, 5 इंच, 7 इंच धँसते-धँसते  मेरा लौड़ा पूरा 8 इंच घुस गया उसकी गांड़ के मांस के अंदर। उधर नम्रता और कुसुम दोनों मेरे को उत्तेजना देने वास्ते बेशरम हो मेरी गांड़ में उंगलिया कर रही थी, दोनों की एक-एक अंगुल मेरी गांड़ को गुदगुदा रही थी और जिससे मैं उछल-उछल कर देवी मीना सुकुमारी की गांड मार रहा था।

यह सारा दृश्य रंजना देख रही थी, हक्की-बक्की। मैंने उसे पुकारा और बोला– ” बेटी, तू भी आजा; आजा मेरी मुन्नी! ”। दरअसल अभी तक मैंने रंजना को नंगा हो छूआ भी नहीं था। मगर आज मुझे उसको अपने लंड का दीदार कराना ही कराना था। उसने कुसुम, नम्रता और मीना की गांड मारने के दृश्य अपनी नंगी आँखों से देखे। मेरा 8 इंच नंगा लंड भी देखा। इन तीनों की तुलना में उसकी गांड छोटी व कमसिन थी। आज उसकी शादी की वर्षगांठ भी थी इसलिए वो दुल्हन के लिबास में थी। मंगलसूत्र, कुमकुम-बिंदी, गहने,   शोभा शृंगार, सब– जिससे वह मदकामिनी लग रही थी। उसके शरीर से कस्तूरी की मादक महक आ रही थी। चमड़ी का रंग केशर सा, फूल-सी कोमल, मीठी बोली चहकती हुई। कमर पतली 23”। मम्मे 32”, सुकुमार, कच्चे-कच्चे, नितंब 33 इंच। ऐसी कन्या की  सिर्फ गांड मारना मुझे उचित नहीं लगा। लेकिन यह भी गलत होता कि मैं सब करूं और उसकी  गांड नहीं मारूं।

जब मैने उसे ” मुन्नी-मुन्नी” कह कर अपने निकट बुलाया तो वह शर्माते हुए मेरे पास आ गई। मैं 59 वर्ष का खूनखवार मर्द और वो 23 साल की कश्मीर की कली। उम्र में 36 साल का अंतर था, एक तरह से पोती की उम्र की बाला थी। मगर मैं कहाँ छोडने वाला था उसे। और नवविवाहिता की तो मैं कस कर लेता हूँ। मेरा भीषण लंड ऐसी कन्या को खराब करने फड़फड़ा रहा था। फिर भी मैंने एक सफ़ेद जाँघिया पहन लिया था हालांकि उसके भीतर से मेरा उठा हुआ लंड साफ़ नजर आता था।

जब रंजना कुमारी, नवविवाहिता, रानी प्यारी —- मेरे पास आई तब मैंने उसे अपनी  नंगी जांघ पर बैठा लिया। और प्यार से एक मधुर चुम्मा लिया। उसके ओठ गुलाब की कली जैसे कोमल थे। मैंने उसके कान भी चूमे, और बोला– ‘गुड़िया, तू तो मेरे बड़े बेटे के छोटे पुत्र की बहूरानी जैसी है और मैं तेरे लिए दादा-ससुर तुल्य। तुम्हारी जैसी मीठी -मचक कन्या अगर दादा-ससुर की सेवा करती है तो तुझे इसी जन्म में पुण्य मिलता है, हो,   मेरी  लाड़ली मुन्नी, ‘  यह कह मैंने उसे अपनी मोटी-मोटी जांघों  के बीच धर दबाया। इस कन्या के नितंब सुखकारी थे जिससे मेरे शिश्न [ COCK ] को आराम मिला। वह थोड़ा रुक-रुक कर बोली—‘ जी, ये तो आप सही कह रहे हैं, और इसमें मेरा फायदा भी है। ‘ वहआगे बोली – ‘  अगर आपको बुरा ना लगे तो मैं एक बात कहूँ?’ मैंने तपाक से उसके गालों पर चुटकी काटी और कहा—- ‘ बोलो, मेरी बुलबुल?”। वह संकोच के साथ बोली —- ‘ बात ये है कि मेरा विवाह तो धोखे से हो गया, मगर मेरे ”वो” [ अर्थात पति ]  मुझे तुष्ट नहीं कर पाते हैं, उनका लिंग भी छोटा, एक छोटी अंगुली-जैसा है। वह लिजलिजा रहता है और चूँसने पर भी खड़ा नहीं हो पाता है। इधर मैंने आपका लंड देखा तो निहाल हो गयी। ‘ वो बोली– ‘ दादा-ससुर जी ! साफ और शुद्ध कहने का बुरा ना मानें, मैं आपका मोटा-कड़क लंड अपने गुप्तांग में घुसा कर सच्ची चुदाई का मज़ा लेना चाहती हूँ। ‘यह सुन कर मेरी बाछें खिल गई, तबीयत हरी  चकाचक हो गई। मैंने उसके गालों पर हथेली रगड़ कर कहा — ‘ तो मैंने मना ही कब किया ?  ‘ यह कह मैंने उस कन्या-बिटिया को नंगी करना चाहा तो उसने माना कर दिया। वो बोली — ‘ऐसे नाहीं दादा-ससुर ! मैं भले घर की हूँ। आप आगे से मेरे दादा-ससुर नहीं, मेरे धरम के  पति बनें, आप मुझसे मंदिर में चल कर मुझसे विवाह कर लें, फिर वो सब कुछ करें जो-जो आप चाहते हैं !’ रुक कर फिर बोली– ‘ मैं पतिव्रता की तरह आपके साथ अपना धर्म निभाउंगी, अर्थात आप जिस-जिस कन्या, स्कूल गर्ल या परस्त्री के साथ संभोग-सेक्स करना चाहेंगे, उसमें मैं पूरी मदद करूंगी; बस मुझे आपके लौड़े का मस्त मज़ा मिलना चाहिए। ”फिर बोली– ‘ और एक बात, इस घटना का कि आपने मुझसे पवित्र ब्याह किया है किसी और को पता नहीं लगाना चाहिए, मेरे वर्तमान पति को भी नहीं, क्योंकि रहूँगी तो मैं उसी नाकारा पति के घर में पर रोज-रोज आप मुझे चोदा करेंगे। ‘ मैं मजबूर था, इसलिए ये बात मान ली।

शादी वाली बात को मीनाकुमारी और कुसुम रानी ने सम्हाल लिया, और तत्काल, उसी वक्त,   दफ्तर के पास बने एक मंदिर में मुझे व रंजना को ले जा, व एक दुष्ट पंडित को समझाबुझा हम दोनों की पवित्र शादी करवा दी। इस क्रियाकर्म में मुश्किल से आधा घंटा लगा। तब तक बरसात भी थम गई थी।

अब मेरे पर बड़ी ज़िम्मेदारी थी। रंजना की, जो दफ्तर में मेरे नीचे रह कर काम करती थी और आगे भी करेगी। मुझे सब गुप्त रखना था। खैर !

” आह, रंजना बेबी, मेरी धर्मपत्नी, मेरी बेटी, आह, आजा -आजा, तुझे दुल्हन के वेश में नंगी करके चोदूँ… , ” मैं मन में बड़बड़ा रहा था कि तभी मीनाकुमारी और नम्रता ने उसे सशरीर उठा एक सजेधजे तख्त पर सुला दिया और फिर मेरे कान में कुसुम रानी बोली– ” लो, पतिदेव, पिता-देव, दादा-देव— लो, दिन दहाड़े सुहागरात मनाओ, कूटो, टूटो, कन्या को मज़े ले-ले कर चोदो ! !”

रंजना बेबी सुहागरात-तख्त  पर इस तरह पसर गयी जैसे वो बेहोश या बेसुध हो। हो सकता है ये उसका नखरा हो या नाटक मगर मेरे लिए शुभ था। मैंने उसे उलटा-पुलटा तो वो ऐसे कसमसाई जैसे नींद में हो। एहतियात के तौर पर मैंने उसे जबर्दस्ती शराब की पूरी बोतल उसके कंठ में लुढ़का दी। में भरपूर नंगा, और मेरे साथ की तीन मदकामिनियां भी चकाचक नंगी-नंगी उछल रही थी, फुदक रही थी। रंजना हालांकि 23 की थी पर उम्र में कफी कमसिन लग रही थी। ऐसे वक्त मैं बहुत अश्लीलता किया करता हूँ, मैं रंजना के पर उकड़ूँ हो बैठ गया,   उसके पेट पर। मैने  नम्रता व दूसरी दो कामिनियों को आज्ञा दी कि  वे मुझमें जोश भरने को मेरे गुप्तांग चाटे-चूँसे या अन्य तरीके से उत्तेजित करें ताकि मेरा लंड  भयानक तरीके से खड़ा हो जाये, लोहे के गरम लाल-भभकते डंडे की तरह। अर्थात एक को कहा कि वो मेरी गांड का छेद कस के चाटे-चूँसे, दूसरी मेरा अंडकोश, और तीसरी मेरे लौड़े के अगल-बगल की  चमड़ी। वो तीनों इस अच्छे काम में लग गई; तब मेरा लंड बड़ा हो बढ्ने लगा, कोई 9 इंच, शायद साढ़े नौ इंच खड़ा हो गया। उसका सोपारा लाल भभक, और फिर सोपारे के छेद में से गाढ़ा वीर्य [ CUM ] झड़ने लगा; जो मैंने बूंद-बूंद कर रंजना गुड़िया के गाल, ओठ, ललाट, और भौंहों के पास पटक दिया। कुछ वीर्य गले के पास भी उगला; मंगलसूत्र तो पूरा उससे भींग गया। मैं नंगा-नंगा रंजना के गले के पास चढ़ा हुआ था और अपना गाढ़ा वीर्य छलका रहा था, फिच्छ-पिच्छ करके। मैंने उसकी ठुड्डी मरोड़ी और मम्मों पर अपने भरी पैर का पंजा मारा ताकि वो हल्के नशे में भी हो तो जाग जाय। वही हुआ। उसने घबराकर मुंह खोला और बोली– ‘ पतिदेव, दादा-प्रीतम !!” तभी मैंने उसे और झँझोड़ा और कहा, ‘ ले बेटी, मेरी मुन्नी, मेरा लंड अपने मुंह में भर, देख इसमें से शहद छलकेगा। ‘ मैंने उसके ओठों के बीच जबर्दस्ती अपना लंड फंसाया और उसके कान में धीमे से बोला– ‘ लंड चूँस, मेरा लंड चूँस, बेटी लंड चूँस!’। नम्रता ने दो अंगुलिया रंजना बेबी के मुंह में डाली और उसका मुंह खोला। मुंह खुलते ही धड़ाक से मैंने अपना लौड़ा इस कमसिन कन्या के मुंह में ठूंस दिया। लौड़ा उसके ओठों के बीच फंसा तो वो उसका सोपारा चूँसने लग गई। मैं लंड को कड़क-कठोर करने के लिए पहले कन्या को सोपारा चुंसवाता हूँ फिर बेरहमी से उसकी चूत मारता हूँ। मैंने देखा कि रंजना को मेरा लंड चूँसने में मज़ा आ रहा है तो मैंने अपने लौड़े को उसके गले की हलक तक धकेल दिया। इससे उसे कुछ खांसी आई पर मैंने परवाह नहीं की। उसने मुंह भींच लिया था और गले से गूं-गूं की आवाज आ रही थी। फिर मैंने निकाला और उसकी जगह अपना अंडकोश मुंह में धकेल दिया। मेरा अंडकोश काफी बड़ा व मोटाताजा था। मैं एक तरह से उसके कंठ पर बुरी तरह से बैठ चुका था, इतना कि कुसुम रानी को मेरी गांड का छेद साफ दिखाई देने लगा। अंडकोश चूँसने के बाद मैं हंसा और रंजना बेटी जो दुल्हन के लिबास में थी उसे धीरे-धीरे प्यार से नंगी करने लगा। जब वह नंग-धड़ंग हो गई तो मैंने उसकी आँखों की ओर अपना लौड़ा ठरकाया, उसने आँखें मूँद ली तो मैंने लंड की चोट उसकी आँखों की पलकों पर की। फिर मैंने उसकी नाभि में अंगुल की और मेरा हाथ शीघ्र ही उसकी पतली नाजुक फुद्दी पर चला गया। पहले मैंने इसमें अपनी अंगुली घुसेड़ दाना [ क्लिट, clitoris ] तलाशा। फिर उसकी टांगें घुटनों से मोड कर उसके कंधों तक की। अब मैंने अपना मोटा लौड़ा रंजना बिटिया की चू त  में  घुसेड़ मारा, और बुरी तरह से पेलने लगा। 9 इंच अंदर घुसा लंड आगे-पीछे करते 4 इंच बाहर आ जाता, उसे दे-दे पक्का-धक्का वापस चूत के अग्र भाग में घुसेड़ता मैं। अपने लंड के साथ  मैं अंगूठी वाली अंगुली भी घुसा रहा था। नम्रता, कुसुम, और मीना तीनों ये देख रही थी कि मेरी उम्र देखते वह बालिका-तुल्य लड़की कैसे चुदवा रही थी और मैं  59 साल का हरामी कैसे  मज़े ले-ले चोद रहा था। जब भी मैं झड़ने को होता मैं सांस रोक, लंड को चूत में से निकाल सोपारे पर चोट मारता जिससे वीर्य वापस  पीछे चला जाता और मैं झड़ता या ख़लास नहीं होता। इस तरीके से मैंने रंजना गुड्डी को सवा घंटे रगड़ा। उसकी तो सांसें फूल गई।

छोकरी चाहे 21 की हो या 17 की या 15 की — जब तक मैं उसकी गांड नहीं मार लेता मुझे संतुष्टि नहीं होती। चूत  तबीयत से चोदने के बाद मेरा धर्म कहता था कि मैं रंजना बिटिया की गांड मारूं। लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं हुई। तो मैं भी छोडने वाला नहीं था। मैंने उसे थोड़ा घसीटा और फिर उलटी पटक उसकी प्यारी गांड पर धौल जमाये व चोट की। इस पर वह उछलकूद करने लगी और मेरी पकड़ से निकल गई। मैं बलवान पट्ठा था, उसे पकड़ वापस खींचा। उसे जबर्दस्ती उलटी लेटाया। मीनाकुमारी को हुकुम दिया कि वो उसकी टांगें पकड़-जकड़ रखे, और नम्रता को कहा कि वो कस कर उसके दोनों हाथ पकड़ ले। कुसुम ने उसे एक हाथ से सिर के बाल खींच  व दूसरे हाथ से माथा दबा जकड़ रखा था। कन्या की कोमल गांड ऊपर उठाई और उसे मैं दबोचने, मसलने, और मरोड़ने लगा। मैंने उसकी गांड में मजबूत तिनका किया जिससे वो तड़फ उठी। मैने गांड के मांस को ऊपर दांतों से काटा जिससे उसकी कोमल चमड़ी पर दंश उभर गए। तत्पश्चात मैंने बलात्कार कर उसकी नाजुक गांड में अपना लंड चुभोया। काले नाग जैसा मेरा मोटा कठोर लंड जब रंजना गुड्डी की गांड के भीतर के मांस को रौंदने और कूटने लगा तब जा कर मुझे लगा कि कुछ-कुछ हुआ। मैंने रंजना की गांड ज्यादा देर नहीं मारी; बस आधा घंटा।

जब इस तरह का गंदा मज़ा लिया जाता है तब बहुत आनंद आता है। शुरू में हर लड़की, हर औरत यह कहती है कि मेरी गांड मत मारो। पर आप किसी तरह दो-तीन बार उसकी गांड मार लेते हैं तो फिर वे ही आपसे कहेंगी” प्लीज़, सर, मेरी गांड मारो, मेरी गांड मारो!!”

कन्या हो, लड़की हो, कामिनी हो, भामिनी हो — जब मैं उनकी गांड मारता हूँ तब बाज दफा गांड पर बेंत या कौड़े भी बरसाता हूँ। मैं अपने पैर के पंजे से उनके मम्मे भी रौंदता हूँ, पैर का पंजा उनकी फुद्दी में भी घुसाता हूँ। मुझे याद है एक आदिवासी  नौकरानी जब चारों पैरों पर घिसट कर पौंचा लगा रही थी तब मैंने उसकी गांड उघाड़ छेद में लकड़ी के चिटिया की नोंक घुसेड़ मारी थी। नौकरानियों को जितना पीटोगे उतना ही वो अच्छा काम करेंगी। मैं तो सेक्स के मामले में गंदा काम करने से चूकता नहीं। एक बार मैंने अपने दोस्त की 18 वर्ष की बेटी को चोदा  था तो चोदने से पहले उस पर मूता था, वह भी उसके मुंह में — छरर-छरर, छर्र-छर्र।

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